इस्लाम में अल्लाह

अल्लाह से मुसलमानों का मतलब क्या है, एकेश्वरवाद पूरे धर्म की धुरी क्यों है, और अल्लाह के निन्यानवे नाम क्या बताते हैं।

मुसलमान ईश्वर को अल्लाह कहते हैं। यह किसी अलग या क़बीलाई देवता का नाम नहीं है। यह एक ईश्वर के लिए अरबी का आम शब्द है, और अरबी बाइबल के हर उस पन्ने पर यही शब्द आता है जहाँ हिंदी बाइबल ईश्वर या परमेश्वर लिखती है। शब्द का व्याकरण भी दलील का एक हिस्सा उठाए हुए है। अल्लाह का न बहुवचन बनता है, न स्त्रीलिंग, इसलिए भाषा ख़ुद ही देवताओं के समूह या किसी दिव्य संगिनी के विचार को जगह नहीं देती। अनुवाद में जो पुल्लिंग सर्वनाम आते हैं, वे व्याकरण की मजबूरी हैं, और मुसलमान उनमें कोई लिंग नहीं पढ़ते।

पूरी आस्था चार अरबी शब्दों में सिमटी है। “ला इलाहा इल्लल्लाह”, अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं। मुसलमान इसे तौहीद यानी एकेश्वरवाद कहते हैं और इसे वह धुरी मानते हैं जिस पर पूरा धर्म घूमता है। इसे समझकर कह देना ही किसी को मुसलमान बनाता है। इससे इनकार करना, या इबादत में अल्लाह के साथ किसी को शरीक ठहराना, वह एक चीज़ है जिसे क़ुरआन उस व्यक्ति के लिए अक्षम्य बताता है जो उसी हालत में दुनिया से जाए।

इस परंपरा में एकेश्वरवाद का मतलब सिर्फ़ एक तक गिनना नहीं है। उसके कई पहलू हैं। अल्लाह है। वही अकेला रब है, यानी हर चीज़ का पैदा करने वाला, मालिक और पालनहार, और उसने दुनिया को चाबी भरकर छोड़ नहीं दिया। स्रोत बताते हैं कि सृष्टि हर पल अपने बने रहने के लिए उसी पर टिकी है। इबादत का हक़ भी अकेले उसी का है, बीच में कोई संत, फ़रिश्ता, नबी या पुरोहित सिफ़ारिशी बनकर खड़ा नहीं होता। और उसे उन्हीं नामों और गुणों से जाना जाता है जो उसने अपने बारे में बताए, न कि उन ख़्यालों से जो लोग उसके बारे में गढ़ लेते हैं।

निन्यानवे नाम

मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से यह बात नक़्ल की जाती है कि अल्लाह के निन्यानवे नाम हैं, सौ से एक कम, और जो उन्हें सीख ले वह जन्नत में जाएगा। यहाँ सीखने का मतलब सूची रट लेने से ज़्यादा है। मतलब यह है कि हर नाम क्या बताता है, यह समझा जाए, और मौक़े के मुताबिक़ उसी नाम से अल्लाह को पुकारा जाए। अर-रहमान, अत्यंत दयावान। अल-ग़फ़ूर, बहुत माफ़ करने वाला। अल-अदल, न्यायी। अल-ख़ालिक़, पैदा करने वाला। अल-बसीर, सब कुछ देखने वाला। मुसलमान दुआ में इन्हें उसी तरह इस्तेमाल करते हैं जैसे आप किसी को उसी गुण से पुकारें जिसका आपको सहारा चाहिए।

इन नामों के साथ-साथ एक सख़्त हद भी चलती है। क़ुरआन अल्लाह के बारे में कहता है कि उस जैसी कोई चीज़ नहीं, और इस्लामी धर्मशास्त्र इसे अक्षरशः लेता है। मन में जो भी तस्वीर बने, वह परिभाषा से ही अल्लाह नहीं है। वह सृष्टि में उतरता नहीं, मानव रूप नहीं लेता, और उसका कोई शरीर नहीं जिसे बनाया जा सके। मस्जिदों में तस्वीरों और मूर्तियों की जगह ज्यामितीय नक़्श और सुलेख होने की बड़ी वजह यही है।

उस तक पहुँचना

इस्लाम अल्लाह के होने को कोई ऐसा प्रमेय नहीं मानता जो सबूत का इंतज़ार कर रहा हो। मान्यता यह है कि हर इंसान सृष्टिकर्ता की एक भीतरी समझ लेकर पैदा होता है, जिसे अरबी में फ़ितरत कहते हैं, और परवरिश और आदत उसे दबा सकती है, मिटा नहीं सकतीं। जहाज़ देखकर आप जहाज़ बनाने वाले का अंदाज़ा लगाते हैं, और दुनिया देखकर उसके बनाने वाले का। क़ुरआन का बड़ा हिस्सा रोज़मर्रा की चीज़ों की तरफ़ इशारा करता है, जैसे बारिश, बीज, अपना शरीर, आसमान, और पाठक से कहता है कि ठीक से देखो।

इस सबका नतीजा किताबी कम और व्यावहारिक ज़्यादा है। मुसलमान लेखन अल्लाह के होने का सबूत देने में उतनी मेहनत नहीं लगाता, जितनी इस पर कि मान लेने के बाद इंसान पर उसका क्या हक़ बनता है। शुक्र, सच्चाई, नमाज़, और यह तैयारी कि जैसा उसने कहा वैसा जिया जाए।

परिचय पर वापस