इस्लाम क्या है?
इस्लाम शब्द का अर्थ, मुसलमान किस बात पर ईमान रखते हैं, वह मान्यता कहाँ से आती है, और दुनिया के मुसलमान असल में कौन हैं।
शुरुआत शब्द से कीजिए। “इस्लाम” अरबी का शब्द है और इसका अर्थ है समर्पण, यानी अपना जीवन ख़ुशी से ईश्वर के हवाले कर देना, किसी दबाव में नहीं। इसी तीन अक्षरों की धातु से अरबी में शांति का शब्द “सलाम” बनता है। जो व्यक्ति इस समर्पण की हालत में हो, उसे मुसलमान कहते हैं। तो धर्म का नाम न किसी संस्थापक पर है, न किसी देश पर। वह एक काम का नाम है, और यही पहली बात जानने लायक़ है।
इस काम के बीचोबीच एक ही दावा है। ईश्वर एक है, उसका कोई साझी नहीं, कोई संतान नहीं, कोई बराबरी वाला नहीं, और इबादत का हक़ केवल उसी का है। मुसलमान उसे अल्लाह कहते हैं, जो ईश्वर के लिए साधारण अरबी शब्द है। अरबी बोलने वाले ईसाई और यहूदी भी अपनी प्रार्थना और अपनी बाइबल में यही शब्द इस्तेमाल करते हैं। बाक़ी सब कुछ इसी एक बिंदु से लटका हुआ है, और मुसलमान लेखक बार-बार इसी पर लौटते हैं।
दावे का दूसरा हिस्सा यह है कि किसी को यह सब पता कैसे चले। मुसलमानों का मानना है कि अल्लाह ने हर क़ौम में नबी भेजे। हर एक के पास वही एक हिदायत थी कि केवल एक ईश्वर की इबादत करो, और हर एक अपने ज़माने के लोगों की हालत से बात करता था। आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, दाऊद और ईसा, ये सब क़ुरआन में नबी के रूप में आते हैं, और मुसलमान पर लाज़िम है कि वह इन सब पर ईमान लाए, किसी एक को दूसरे से ऊपर रखे बिना। सातवीं सदी के अरब में रहने वाले मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) इसी क़तार के आख़िरी माने जाते हैं। इस समझ के हिसाब से इस्लाम सन् 610 में शुरू नहीं हुआ। वह वही संदेश है जो हर नबी लेकर आया, बस अपनी आख़िरी और अटल शक्ल में।
मुसलमान क्या मानते हैं और क्या करते हैं
आस्था को आम तौर पर ईमान के छह स्तंभों में समेटा जाता है। अल्लाह, उसके फ़रिश्ते, उसके नबी, उसकी उतारी हुई किताबें, क़यामत का दिन, और तक़दीर, यानी यह कि कुछ भी अल्लाह के इल्म और इरादे से बाहर नहीं होता। अमल को पाँच स्तंभों में समेटा जाता है। ईमान की गवाही, दिन में पाँच बार नमाज़, ग़रीबों के लिए साल में एक बार निकाली जाने वाली ज़कात, रमज़ान के महीने का रोज़ा, और जो सक्षम हो उसके लिए ज़िंदगी में एक बार मक्का का हज। दोनों सूचियों का अपना अलग पन्ना यहाँ मौजूद है।
आस्था और इबादत के बीच में रोज़मर्रा की बहुत सी हिदायत बैठी है। लेन-देन में ईमानदारी, माँ-बाप के साथ अच्छा सुलूक, पड़ोसी की ख़बरगीरी, लोगों के बारे में ज़बान पर लगाम। मुसलमान विद्वान लंबे अरसे से शरीअत का मक़सद पाँच चीज़ों की हिफ़ाज़त बताते आए हैं, यानी धर्म, जान, अक़्ल, माल और परिवार। यह ढाँचा बताता है कि यह परंपरा ख़ुद को किस तरह देखती है। यह दस्तख़त कर देने भर के सिद्धांतों की सूची कम है, और जीने का वह तरीक़ा ज़्यादा जिससे एक घर और एक समाज बँधा रहे।
मुसलमान कौन हैं
ज़्यादातर मुसलमान अरब नहीं हैं। मोटे तौर पर हर पाँच में से चार अरब दुनिया के बाहर रहते हैं। सबसे बड़ी आबादियाँ इंडोनेशिया, पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश में हैं, और उनके आगे नाइजीरिया से बोस्निया तक फैले हुए समुदाय। भारत में मुसलमान क़रीब चौदह सदियों से बसे हैं, और यहाँ उनकी गिनती किसी भी अरब देश से ज़्यादा है। अरब ख़ुद भी सब मुसलमान नहीं हैं। उनमें ईसाई भी हैं, दूसरे धर्मों के लोग भी, और वे भी जो किसी धर्म को नहीं मानते।
मुसलमान बनना कोई लंबी काग़ज़ी कार्रवाई नहीं है। कोई व्यक्ति समझ और सच्चे मन से कह दे कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं, तो दहलीज़ पार हो गई। आगे के पन्ने यही खोलकर रखते हैं कि उस एक वाक्य के साथ क्या-क्या आता है।